सत्ता, सिस्टम के रथ पर सवार, संभावित, आय व्यय का ब्यौरा स्वार्थवत संस्कृति में पहचान खोते प्रमाण सिद्धान्त
सिद्धतः का मोहताज, व्यवहार लम्बे भाषण में स्पष्ट न तो एक्सन, न ही विजन
एक राष्ट्र भक्त स्वतः सिद्ध विदेशी विद्ववान लार्ड मेकाले से आज मुझे कोई जलन नहीं, मगर मुझे अपने प्रति आक्रोश और मेकाले की विद्वतता के प्रति सम्मान है। क्योंकि इसने अपनी विद्ववतता, ज्ञान का सार्थक उपयोग अपने राष्ट्र अपनी मातृ भूमि, ब्रिटेन के साम्राज्य के विस्तार और सेकडो वर्ष तक यूरोपीय संस्कृति के हित में किया।
मगर अपने विधान से बडी अपने महान संविधान की आत्मा को अंगीकार करने वाले हम भारतवर्ष के लोग आजादी के 70 वर्ष बाद भी अपनी विद्ववतता सिद्ध सार्थक करने में अक्षम असफल सिद्ध हुये। परिणाम कि एक रूपया बराबर की कीमत वाला डाॅलर आज 70 वर्षो में 70 रूपये के पार है। अकूत संपदा, प्रतिभायें होने के बावजूद हम समृद्ध, शिक्षा, कौशल उत्पादन नये बाजारों के मोहताज है। कहते है जिस देश में मिट्टी से लेकर हीरा सोने का मूल्य और घास से लेकर श्रम का अकल्पनीय पुरूषार्थ हो, वहां की अर्थव्यवस्था बैवस, मजबूर और प्राकृतिक मानवीय संपदा संसाधनों की मोहताज हो तो ऐसे में कारण स्पष्ट है कि निर्जीव शिक्षा, संस्कारों से 70 वर्षो में जन्मी वह स्वार्थवत संस्कृति जिसने राजनीति अर्थ, समाज में गहरी पैठ बना सत्ताओं सिस्टम और सिद्धान्त को कलंकित करने का काम किया है। अगर ऐसे में एक समृद्ध, सशक्त सक्षम नेतृत्व में राष्ट्र-जन के हितों की जरूरतों का ध्यान रख वार्षिक आय व्यय का व्यौरा बजट सत्ता सिस्टम के रथ पर सवार सारथी के 2 घण्टे से अधिक के लम्बे भाषणों से सिद्धान्तः समझाने की कोशिश होती है। तो निश्चित ही उसके व्यवहारिक परिणामों पर सवाल होना स्वभाविक है।
ये अलग बात है कि इस व्यवहारिक बजट को देश के प्रधानमंत्री ने विजन और एक्सन प्लान वाला बजट बताया है। जिसमें कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा, ग्रामीण, विकास अधोसरंचना निर्माण की चर्चा है तथा कृषि में 2.83 लाख शिक्षा 99.300 हजार, स्वास्थ्य 69000 करोड परिवहन 1.7 लाख करोड का प्रावधान किया गया है। जिससे साफ है कि अहम क्षेत्रों के लिये आर्थिक संसाधनों का स्वरूप क्या होगा यह स्पष्ट किया है। जो मौजूदा सिस्टम को आगे ले जायेगा। जबकि होना यह चाहिए था और ऐसा भी हो सकता था कि जब शसक्त राष्ट्र का लक्ष्य, नये भारत निर्माण के साथ है। ऐसे में शिक्षा पद्धति उसकी विषय वस्तु शोधात्मक, संसाधनों के साथ स्वच्छ शास्त्रार्थ विभिन्न प्राकृतिक मानवीय संपदाओं के प्रमाणिक सेवा ऊर्जा आवश्यकता सूचकांको के केन्द्रों की की बात होती और विभिन्न क्षेत्रों में सहज, सार्थक उत्पादन, श्रम में बडे पैमाने पर निवेश की बात होती। जिससे एक राष्ट्र एक विधान और स्वाभिमानी एक निवेश रिटर्न अनेक पर आधारित लघु मध्यम दीर्घकालिक कार्यक्रमों की चर्चा होती तो यह बजट और सराहनीय माना जाता।
ये सही है कि इसी सिस्टम में मौजूदा अर्थव्यवस्था में कुछ क्षेत्रों को नियंत्रित कर अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार की सिद्धान्तः बात बजट में मौजूद विजन के साथ है। मगर जब तक सत्तायें और अधिक संवेदनशील और सलाहकार सिद्ध पुरूष नहीं होगें तब तक एक सक्षम सशक्त नेतृत्व होने के बावजूद दशा और दिशा में भटकाव और प्रमाण प्रमाणिकता, पुरूषार्थ का अभाव सार्थकता, सिद्धता में बना रहेगा। जो दिव्य भव्य संसाधनों से पटे इस भूभाग पर एक बडा सवाल बना रहेगा। क्योंकि सिद्धता ज्ञान किसी ऐसी अंकों से सजी डिग्रीयां प्रमाण का मोहताज नहीं होती, जो दुर्भाग्य बस हम मेकाले की विरासत के रूप में विगत 70 वर्षो से ढोते-ढोते प्रमाणिकता, सिद्धता के पैमाने को ही आज हम खो चुके है और जिन्हें प्रमाण, प्रमाणिकता माना जाता रहा है। काश काॅरपोरेट कल्चर पर सत्ता सियासत चमकाने वाले लोग इस सच को समझ पाये। कहते है समर्पित सार्थक नेतृत्व है तो उसका राष्ट्र-जन हित में सार्थक दोहन शीघ्रता और सफलता से होना चाहिए जो किसी भी राष्ट्र को समृद्ध, खुशहाल बना उसकी सार्थकता सिद्धता कर सके।
मगर अपने विधान से बडी अपने महान संविधान की आत्मा को अंगीकार करने वाले हम भारतवर्ष के लोग आजादी के 70 वर्ष बाद भी अपनी विद्ववतता सिद्ध सार्थक करने में अक्षम असफल सिद्ध हुये। परिणाम कि एक रूपया बराबर की कीमत वाला डाॅलर आज 70 वर्षो में 70 रूपये के पार है। अकूत संपदा, प्रतिभायें होने के बावजूद हम समृद्ध, शिक्षा, कौशल उत्पादन नये बाजारों के मोहताज है। कहते है जिस देश में मिट्टी से लेकर हीरा सोने का मूल्य और घास से लेकर श्रम का अकल्पनीय पुरूषार्थ हो, वहां की अर्थव्यवस्था बैवस, मजबूर और प्राकृतिक मानवीय संपदा संसाधनों की मोहताज हो तो ऐसे में कारण स्पष्ट है कि निर्जीव शिक्षा, संस्कारों से 70 वर्षो में जन्मी वह स्वार्थवत संस्कृति जिसने राजनीति अर्थ, समाज में गहरी पैठ बना सत्ताओं सिस्टम और सिद्धान्त को कलंकित करने का काम किया है। अगर ऐसे में एक समृद्ध, सशक्त सक्षम नेतृत्व में राष्ट्र-जन के हितों की जरूरतों का ध्यान रख वार्षिक आय व्यय का व्यौरा बजट सत्ता सिस्टम के रथ पर सवार सारथी के 2 घण्टे से अधिक के लम्बे भाषणों से सिद्धान्तः समझाने की कोशिश होती है। तो निश्चित ही उसके व्यवहारिक परिणामों पर सवाल होना स्वभाविक है।
ये अलग बात है कि इस व्यवहारिक बजट को देश के प्रधानमंत्री ने विजन और एक्सन प्लान वाला बजट बताया है। जिसमें कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा, ग्रामीण, विकास अधोसरंचना निर्माण की चर्चा है तथा कृषि में 2.83 लाख शिक्षा 99.300 हजार, स्वास्थ्य 69000 करोड परिवहन 1.7 लाख करोड का प्रावधान किया गया है। जिससे साफ है कि अहम क्षेत्रों के लिये आर्थिक संसाधनों का स्वरूप क्या होगा यह स्पष्ट किया है। जो मौजूदा सिस्टम को आगे ले जायेगा। जबकि होना यह चाहिए था और ऐसा भी हो सकता था कि जब शसक्त राष्ट्र का लक्ष्य, नये भारत निर्माण के साथ है। ऐसे में शिक्षा पद्धति उसकी विषय वस्तु शोधात्मक, संसाधनों के साथ स्वच्छ शास्त्रार्थ विभिन्न प्राकृतिक मानवीय संपदाओं के प्रमाणिक सेवा ऊर्जा आवश्यकता सूचकांको के केन्द्रों की की बात होती और विभिन्न क्षेत्रों में सहज, सार्थक उत्पादन, श्रम में बडे पैमाने पर निवेश की बात होती। जिससे एक राष्ट्र एक विधान और स्वाभिमानी एक निवेश रिटर्न अनेक पर आधारित लघु मध्यम दीर्घकालिक कार्यक्रमों की चर्चा होती तो यह बजट और सराहनीय माना जाता।
ये सही है कि इसी सिस्टम में मौजूदा अर्थव्यवस्था में कुछ क्षेत्रों को नियंत्रित कर अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार की सिद्धान्तः बात बजट में मौजूद विजन के साथ है। मगर जब तक सत्तायें और अधिक संवेदनशील और सलाहकार सिद्ध पुरूष नहीं होगें तब तक एक सक्षम सशक्त नेतृत्व होने के बावजूद दशा और दिशा में भटकाव और प्रमाण प्रमाणिकता, पुरूषार्थ का अभाव सार्थकता, सिद्धता में बना रहेगा। जो दिव्य भव्य संसाधनों से पटे इस भूभाग पर एक बडा सवाल बना रहेगा। क्योंकि सिद्धता ज्ञान किसी ऐसी अंकों से सजी डिग्रीयां प्रमाण का मोहताज नहीं होती, जो दुर्भाग्य बस हम मेकाले की विरासत के रूप में विगत 70 वर्षो से ढोते-ढोते प्रमाणिकता, सिद्धता के पैमाने को ही आज हम खो चुके है और जिन्हें प्रमाण, प्रमाणिकता माना जाता रहा है। काश काॅरपोरेट कल्चर पर सत्ता सियासत चमकाने वाले लोग इस सच को समझ पाये। कहते है समर्पित सार्थक नेतृत्व है तो उसका राष्ट्र-जन हित में सार्थक दोहन शीघ्रता और सफलता से होना चाहिए जो किसी भी राष्ट्र को समृद्ध, खुशहाल बना उसकी सार्थकता सिद्धता कर सके।